Remembering JNU

कुछ पल में सदियाँ गुजरने लगी है,

ये धुप आज मुझपर बिखरने लगी है,

तेरे उन पेड़ों की छांव में जो दिन गुज़ारे,

आज उनकी यादें ही ये हवा ताज़ा करने लगी है,

अब की रात भी क्या रात है? रातें तो वो थी,

जो नींदों को हमसे दूर करने लगी थी,

बात अगर तन्हाई की है, तो मुझे तन्हाई भी वही पसंद थी,

कम से कम एक वक़्त पर मुझसे बात तो करने लगी थी,

माना मैंने मेरा जो वक़्त वहां गुज़रा,

वो यादग़ार रहेगा, पर आस लेकर दिन गुज़ारने की किसको पड़ी थी,

शायद अब दूर रहकर ही बिता लूँगा ज़िन्दगी वहां से,

ये ज़िन्दगी भी तो अब बहुत तेज़ चलने लगी थी |


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