तेरा मैं

मुझसे ऐसी कुछ हुई है खता

कि क्या कहूँ, परेशां हूँ मैं

सोचा है कि बयाँ करूँ तुझसे

पर किससे, मेरा तू या तेरा मैं

दिन गुज़रता नहीं, रात ठहरती नहीं

दो रंगों के आसमान में जीता हूँ मैं

लोग नए रोज़ से जीते हैं ज़िन्दगी

पिछली रात के टूटे ख्वाबों में जीता हूँ मैं

हसीन पल कुछ चुराकर खुश होता हूँ

पर उनकी असलियत से वाकिफ़ हो गमगीन होता मैं

कैसे कहूँ मेरी परेशानी में शामिल तुम भी

तुम हो सुलझन, पर उलझन हूँ मैं

आज एक तरक़ीब से पाया वह एहसास

जो तेरे साथ सोचता था मैं

क्या हूँ मैं, न कहता किसी से

बस मरता हूँ अन्दर ही अन्दर मैं

सब बेमानी है, बिन मतलब

जैसे तेरे बिन अब हूँ मैं

तू समझ जाये तो बात ही क्या है

कुछ कहना न हो, और सब बोल दूँ मैं


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