जो हादसा न हो सका

एक पल तक मैं कुछ आराम से बैठा बातें फ़रमा रहा था
फिर अचानक कुछ जल्दी हुई, मैं उठकर चल दिया
चलने लगा तो दो कदम के बाद ही टकरा गया
न बढ़ सका कुछ आगे, पावँ मेरा कुछ बंधा सा गया
मन न माना रुकने का, ज़िद्द में आगे बढ़ता गया
जाता कहाँ, कुछ पैर मारकर वहीँ उसी जगह लड़खड़ा गया
और औंधे मुंह घुटने पर आ अपनी हार कुछ मान ही गया
फिर किसी हाथ ने संभाला मुझको
न देखा मेरा दिल न मेरी शख्सियत, मेरी ज़रूरत से ही आँका मुझको
मैंने अपनी हार की शर्म में, न देखा और न ही जाना उसको
कुछ पल ज़िन्दगी के खो दिए थे, घटना और दुर्घटना के ख्यालों से
बच गया आखिर इस ख़याल ने फिर जगाया मुझको
एक डर घर कर गया था जिसने जीना सिखाया मुझको
अफ़सोस शुक्रिया अदा न किया उसका, जिसने गिरने से बचाया मुझको…

Livè Myself: Xk


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