तुम्हे मालूम नहीं दुनिया कैसे चलती है
हाकिमों की गुलामी और मौत यहाँ कुछ सस्ती है
अरमानों की दुनिया यहाँ से कुछ आगे जाकर बस्ती है
धर्म ज्ञान कहलाता है और ज्ञान में साजिशें चलती है
सच झूठ सबका अपना-अपना है यहाँ
हकीक़त तो इरादों की परछाई में चलती है
तुम्हे मालूम नहीं दुनिया कैसे चलती है
गरीबों के हक पर अमीरों की गाडी चलती है
इन्साफ के बाज़ार में न्याय की नीलामी लगती है
आदमी जानवर है और जानवर की कीमत इंसान से अच्छी है
फिर मैं कहाँ और तुम कहाँ
राजनीती में समाज और समाज में राजनीती कुछ इस तरह बस्ती है
तुम्हे कुछ नहीं मालूम ये दुनिया कैसे चलती है
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