अगर तुम कह देते जो कहना चाहते
तो बात यहाँ तक न पहुँचती
एक दुसरे की मौजूदगी
हमें यूँ बेचैन न करती
ठुकरा दिया होता तुमने अपने अहम् को
हमने अपने डर को
तो आज मैं लिख न रहा होता
और तुम पढ़ न रहे होते…

अगर तुम कह देते जो कहना चाहते
तो बात यहाँ तक न पहुँचती
एक दुसरे की मौजूदगी
हमें यूँ बेचैन न करती
ठुकरा दिया होता तुमने अपने अहम् को
हमने अपने डर को
तो आज मैं लिख न रहा होता
और तुम पढ़ न रहे होते…
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