कल से आज को देख रहा हूँ…

ऐसे हालात जब रोज़मर्रा की चीज़ें हादसा लगने लगी

तब कुछ पल ठहरा, देखा आज कहाँ हूँ

ये जानना बहुत ज़रूरी था कि ऐसा क्यों है

शायद एक लम्बे अरसे से ज़िन्दगी बस जी रहा हूँ

एक अरसे पहले ही एक हादसे ने ज़िन्दगी बदल दी थी

आज हर लम्हा एक हादसा है

यकीन करना मुश्किल हो गया है कि मैं ऐसा बन गया हूँ

हर इंसान की तरह मैं भी वक़्त का नतीजा हूँ

दरअसल मैं आज भी उस वक़्त में कैद हूँ जो गुज़र गया

मैं आगे नहीं बढ़ा, वक़्त आगे बढ़ रहा है

मैं बीते दिनों के चश्में से आज को देख रहा हूँ

न जाने कब तक, शायद मन ही मन किसी हादसे का इंतज़ार कर रहा हूँ…


Leave a comment