मुझे बांध लो कविता में
और साथ ले जाओ
मुझे नहीं रहना यहाँ
उदास इस जहाँ में
तुम साथ होगे तो
सब सह लेंगे हँसकर
लिख दो आज मुझे
तोड़ तो मुझे एक नज़्म में
उतार दो कागज़ में
स्याही कर दो मुझे
कोई दाग न छोड़ना
लफ्ज़ भी रोते हैं
जानते हो तुम
जब तुम सो जाते हो
तो सुनता हूँ उनका गिला
कह रहा हूँ लिख दो मुझे
ले जाओ, कविता बनाकर
जब भी कहोगी
मुझको साँस मिलेगी
जब भी दोहराओगी मन में
ज़िंदा हो जाओगी
सुनेगा कोई तब हम साथ होंगे
एक ही पल में एक होंगे
मिलेंगे और जुदा होंगे
पर तुम्हारी जुबां पर होंगे
लिख दो हमें
बेताब है हम
चाहते हैं बनना लफ्ज़ तुम्हारे
मिलेगी एक पहचान
तुम्हारी जुबां से
बाँध लो हमें
कि हम बिखरने वाले हैं
पहले टूट चुके हैं बहुत
खुद ही जोड़ा था तब
आज इंतज़ार है
कोई पिरोह दे लफ़्ज़ों में
बांध लो कि देर न हो जाए
कि कहीं ये रात बीत न जाए
सुबह होगी तो मैं नहीं
लफ़्ज़ो की लाश मिलेगी
साथ नहीं चल सकेंगे तुम्हारे
फिर भी कन्धा देना
एक और नज़्म लिखना
हम नहीं, हमारी रूह
लिखोगे तो हम मिलेंगे
चाहोगी तो नज़र आएंगे
बाँध लो हमें नज़रों में
कि हम लफ्ज़ है, सुनाई देते हैं
ज़िंदा रखना है तुम्हे
तुम दोहराते रहना, हम सांस लेते रहेंगे
बांध लो कि देर न हो जाये।
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